क्या मक्का इमाम ने सऊदी अरब के इसराइल के साथ सामान्यीकरण के बारे में बात की थी?

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MiddleEastEye अख़बार के साथ – साथ मुस्लिम ब्रदरहुड समाचार एजेंसियों ने मक्का के इमाम शेख अब्दुर्रहमान सुदाइस पर गलत तरीके से आरोप लगाया है।
जो कि जुमे के ख़ुत्बे के दौरान जब शेख़ सुदेस ख़िताब फ़रमा रहे थे तो आलम ए इस्लाम के दु-श्मन और साऊदी अरब के मुख़ालिफ़ जिनको इसी काम के लिए बेठाया गया है की साऊदी अरब के ख़िलाफ़ बोला जाए और मुसलिमों मैं इख़्तिलाफ फैलाना है।

अखबारों के ज़रिये से फैलाई गयी साजिश क्या है ?
आपको बता दे इस रिपोर्ट को मक्का मुकर्रमा के इमाम के खिलाफ मासूम मुलमानो में नफरत पैदा करने के लिए तैयार किया गया है , क्यूंकि इस रिपोर्ट की सुर्खिया ही अलग-अलग है।

जबकि सुर्खियों में कहा गया है की “मक्का मुकर्रमा में जो खुत्बा कहा गया है यह इ-ज-रा-इ-ल के साथ सऊदी अरब के सामान्यीकरण पर सवाल उठाता है।

जबकि सामग्री में कहा गया है कि, “मक्का मुकर्रमा की अज़ीमुश्शान मस्जिद के इमाम अब्दुलरहमान अल-सुदैस द्वारा एक ख़ुत्बे में कहा गया है , जिसके बाद सोशल मीडिया पर हलचल मच गई थी इ-ज-रा-य-ल के साथ सऊदी के सामान्यीकरण की प्रस्तावना के रूप में कुछ लोगों की दिलचस्पी बढ़ गयी थी।

इस रिपोर्ट में किसी भी सरकारी बयान या किसी सरकारी तर्जुमे का हवाला नहीं दिया दिया गया है ,और न ही तस्दीक़ की गई है कोई ऐसी वीडियो का हवाला दिया गया हे जिसमे ख़ुतबके का इंग्लिश तर्जुमा आया हो। “कुछ लोगो की तर्जुमानी” इस में धोके से ज़िक्र किया गया है।

फ़िलहाल सवाल यह आता है की ये “कुछ लोग ” कौन है? “ये कुछ” कहाँ रहते है ? इन “कुछ” ने ख़ुत्बे का मतलब इ-ज-रा-इ-ल के साथ सऊदी अरब का सामान्यीकरण की खोलना कैसे की ? क्या यह “कुछ” एक है , या फिर ये “कुछ ” बहुत सारे लोग है ?

संक्षेप में, रिपोर्ट एक स्पष्ट-कट झूठ पर आधारित है और उल्टा मकसद स्पष्ट है, जो मुसलमानों के जज़्बात को भड़काना है कि इस्लाम की सबसे पाक जगह मक्का मुकर्मा खाड़ी देशो की राजनीति का केंद्र बन गया है।

जुमे के रोज़, एक सऊदी कार्यकर्ता अब्दुल्ला मोहम्मद अल-हरबी ने मक्का के इमाम के ख़ुत्बे की तस्वीरें पोस्ट कीं और अरबी में उल्लेख किया कि, ” शेख प्रो डॉ। अब्दुल रहमान अल-सुदैस ने जुमे के रोज़ के उपदेश में कहा: ‘फिलिस्तीन और मस्जिद अल-अक्सा हमारा पहला इस्लामी मुद्दा है जिसे नए संघर्षों में नहीं भूलना चाहिए।

इसके अलावा, सऊदी अरब के विदेश मंत्री फरहान बिन फैसल ने बुध के रोज़ को घोषणा की कि फिलिस्तीनी कारण के लिए किंगडम का समर्थन और फिलिस्तीनी लोग संयुक्त अरब अमीरात से आने और जाने वाली उड़ानों के लिए सऊदी हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की मंजूरी के बावजूद नहीं बदले हैं।

21 अगस्त को, सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख प्रिंस तुर्क बिन फैसल अल-सऊद ने कहा कि, “इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सऊदी अरब की कीमत यरूशलेम के साथ एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी का निर्माण है”।

2002 के अरब शांति पहल का प्रस्ताव सऊदी अरब के मरहूम किंग अब्दुल्ला अल-सऊद ने इज़राइल राज्य को दिया था। एपीआई के अनुसार, अरब देश इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाएंगे, बदले में इजरायल को वेस्ट बैंक, गाजा और पूर्वी यरुशलम सहित सभी क्षेत्रों से अपनी सेना और बस्तियों को वापस लेना चाहिए, जो 1967 के मध्य पूर्व युद्ध में कब्जा कर लिया गया था। इसके अलावा, पूर्वी यरूशलेम को फिलिस्तीन की राजधानी होना चाहिए।

नतीजा निकला , यूएई के इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का निर्णय फिलिस्तीनी क्षेत्रों के भविष्य के विनाश को रोकना है, जबकि सऊदी अरब एपीआई-2002 के साथ साबित है जो फिलिस्तीन के साथ यह दावा करता है कि जून 1967 से पहले के दौर में , एक दिन दोनों भाई देशों के पास अपने एजेंडा स्पष्ट हैं।

हालांकि, सऊदी अरब और उनके इमामों और नेताओं के खिलाफ उनके मुस्तक़िल हमलों के साथ ब्रदरहुड के प्रचार का उद्देश्य है। यह दुनिया भर में मुसलमानों और अरब नेताओं के बीच दरार पैदा करने के लिए जहन्नुम तक है जो आखिर में और अराजकता पैदा करेगा, ताकि ईरान, तुर्की और कतर अपने क्षेत्रीय राजनीतिक खेल खेलने के लिए नफरत के बीज बो सकें।

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